विश्व योग दिवस 2025 से कितने प्रतिशत बढ़ी योग के प्रति जागरूकता
बीसवीं सदी में तमाम ऐसे योगपुरुष उत्पन्न हुए जिन्होंने योग के माध्यम से देश को जागरूक करने का प्रयास किया । इन प्रयासों का राष्ट्र पटल पर ऐसा प्रभाव पडा कि विश्वविद्यालयों के माध्यम से योग शिक्षण का प्रसार होने लगा ।
समय ने अपनी करवट बदली और विश्व योग दिवस का आगाज हुआ । २०१४ में यह एक क्रांति के रूप में समूचे विश्व में इतना अधिक गुंजा कि २०१६, २०१७ तक अनेकों देशों की सरकार ने विश्व योग दिवस पर सामूहिक योग प्रोटोकॉल का नियम पारित किया । प्रारंभ में न्यूयॉर्क, पेरिस, बीजिंग, बैंकॉक, कुआलालंपुर, सियोल जैसे देशों ने अंतर्राष्ट्रीय प्रस्ताव के पारित होने के बाद इसे सामूहिक तौर से मनाया बाद में अनेकों अन्य देशों में भी यह सरकारी रूप से प्रसारित हुआ ।
इस बार योग दिवस में अनेक बड़े मंचों पर एकतरफ पहले से अधिक रौनक और उत्साह था तो दूसरी तरफ अनेकों संघीय कार्यालयों और संस्कृति को प्रोत्साहन करने का दावा करने वाले नेताओं में यह ठंडा दिखाई पड़ रहा था ।
अनेकों नेताओं ने विश्व योग दिवस के नाम पर भीड़ तो जमा की किन्तु कहीं पर क्रिकेट हुआ तो कहीं पर सिर्फ नेताओं के भक्तों ने अपने नेताजी के साथ सेल्फी ली ।
कहीं पर योग इवस का रिकोर्ड जमा करने का प्रेशर था इसलिए समूह के साथ दोनों हाथ उठाकर एक फोटो, वृक्षासन में दूसरा फोटो और अनुलोम विलोम करते, तीसरा फोटों, मोबाईल से खींचा गया और उनके कार्यालयों में भेज दिया गया . रिकोर्ड जमा हो गया कि भाईसाहब की टीम ने जोश से योग प्रोटोकॉल पर योग अभ्यास किया ।
हमारी टीम के एक सदस्य जो कि योग गुरु एवं एक समाजसेवी भी हैं , योग दिवस पर प्रातः बीजेपी के पूर्व विधायक के घर पर पंहुचे तो वहाँ किसी अन्य पूर्व इवेंट का सर्टिफिकेट वितरण चल रहा था । नेता जी प्रेमीगणों के साथ सेल्फी लेने में इतना अधिक मशगूल योग गुरूजी का मिलने का प्रयास व्यर्थ गया ।
मोदीजी ने देश की सत्ता संभाली और योगीजी ने उत्तर प्रदेश की । हिंदु धर्म को जागरूक करने की बात करने वाले तमाम नेतागणों को अभी तक यह नहीं पता कि संस्कृति से जुडी तमाम ऐसी योजनायें जैसे - राष्ट्रीय आयुष मिशन (NAM), आयुष स्वास्थ्य और कल्याण केंद्रों (AHWCs), मुख्यमंत्री स्वदेशी गौ संवर्धन योजना एवं ऐसी अनेकों ट्रस्ट को को योजनाओं के साथ बढ़ावा देने का कार्य किया जा सकता है । ये ऐसी योजनायें हैं जिन्हें शहर से ज्यादा ग्रामीण क्षेत्रों की है । किन्तु ग्रामीण क्षेत्रों के लोग अभी बस एक बात सीख रहें हैं - “सब छोड़कर किसी बड़े शहर की तरफ पलायन करना ।” ग्रामीण नेताओं को अब मोदीजी जैसी सोच रखने की आवश्यकता है । यदि हिन्दू को मुद्दा बनाकर कार्य करेंगें तो समाज उलझेगा किन्तु यदि संस्कृति को मुद्दा बनाकर कार्य करेंगें तो भारत और हिंदुत्व दोनों मजबूत होगा ।
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